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मालपुरा में गौ काष्ठ से हुआ अंतिम संस्कार

मालपुरा में गौ काष्ठ से हुआ अंतिम संस्कार

टोंक ! मृत्यु अंतिम सत्य तो अन्त्येष्टि जीवन का आखिरी संस्कार है। इसके लिए लकड़ी की चिता पर अंतिम संस्कार की मान्यता अब पर्यावरण के लिए नुकसानदेह साबित होने लगी है और हजारों की संख्या में पेड़ कटने से जीवन के लिए खतरा दिन-ओ-दिन बढ़ता जा रहा है। हालांकि विद्युत शव दाह गृह का विकल्प दिया गया लेकिन यह विकल्प पारंपरिक मान्यताओं के चलते ज्यादा कारगर नहीं हो सका है। इसपर बेहद गंभीर लोगों ने अब अंत्येष्टि में लकड़ी के विकल्प को खोज निकाला है। अब अंतिम संस्कार के लिए न तो लकड़ी जलानी पड़ेगी और न ही पेड़ काटने पड़ेंगे। अब देश प्रदेश में गौ काष्ठ से अंतिम संस्कार का भी चलन हो गया है। ऐसी ही यह अनूठी शुरुआत मालपुरा में भी हुई है।
मालपुरा में त्रिलोकचंद, रामेश्वर,अशोक विजयवर्गीय की वयोवृद्ध माताजी पुष्पा देवी विजयवर्गीय के देहावसान पर परिवारजनों ने गौसेवा समिति, जयपुर की प्रेरणा से गौशाला निर्मित पवित्र गौमय- काष्ठ से दाह संस्कार का प्रशंसनीय एवम अनुकरणीय कार्य किया।
इससे जहां गौरक्षा व गौपालन को बढ़ावा एवम गौसेवा शालाओं को आर्थिक स्वावलम्बन मिलेगा। वहीं गौमय की उपियोगिता बढऩे के साथ साथ जहां बीमार, वृद्ध , निराश्रित गौमाता को अनुपयोगी समझ कर कत्लखानों में कटने से बचाने में सहयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त एक शव दाह में दो-तीन पेडों  को भी कटने से बचाया जाकर पृथ्वी और पर्यावरण की रक्षा भी सम्भव होगी, क्योंकि केवल मानव नहीं अपितु जीव मात्र सहित सम्पूर्ण सृष्टि को अनिवार्य प्राणवायु (ऑक्सीजन) पेड़ों के माध्यम से ही प्राप्त होती है।
देश में अनेक स्थानों पर होलिका दहन और शवदाह कर्म गौमय कंडों के द्वारा ही सम्पन्न किये जाने का प्रचलन है । गौमय-काष्ठ का उपयोग लकड़ी से अधिक श्रेष्ठ, लाभदायक और मितव्ययी होता है।
गौ सेवा समिति, जयपुर राजस्थान के प्रयास और प्रेरणा से जयपुर, कोटा सहित अनेक स्थानों पर असंख्य गौभक्त परिवार इसके लौकिक एवम आध्यात्मिक महत्व को समझ कर,  स्वयम के अपने और परिवारजनों के शवदाह गौमय काष्ठ द्वारा ही किये या करवाये जाने हेतु संकल्पित हो रहे हैं।
मालपुरा में  इस परमावश्यक पवित्र दिव्य परम्परा की शुरुआत का विचार गोपाल, रामेश्वर विजयवर्गीय सहित सभी परिवारजनों ने लिया।
डॉ. ज्ञानेन्द्र दत्त रावल, गव्यसिद्ध-चिकित्सक, मालपुरा ने बताया कि श्रीकृष्ण गौशाला, सदरपुरा रोड, मालपुरा के सान्निध्य में  भविष्य में भी मालपुरा में गौमय काष्ठ द्वारा  होलिका दहन एवम शव-दहन हेतु  गौमय-काष्ठ एवं गौमय कण्डे  उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की जा रही है।  होलिका-दहन के लिए 31 जनवरी 2024 तक आवश्यकता के अनुसार अपनी मांग गिरधारीलाल आगीवाल, महामंत्री, श्रीकृष्ण गौशाला, मालपुरा सहित त्रिलोक विजयवर्गीय,ओम प्रकाश नामा, मालपुरा से की जा सकती है।
लकड़ी से बेहतर, पर्यावरण हितैषी भी
लकड़ी में 15 फीसद तक नमी होती है, जबकि गो-काष्ठ में डेढ़ से दो फीसद ही नमी रहती है। लकड़ी जलाने में 5 से 15 किलो देसी घी या फिर रार का उपयोग होता है, जबकि गो-काष्ठ जलाने में एक किलो देसी घी पर्याप्त होगा। लकड़ी के धुएं से कार्बन डाईआक्साइड गैस निकलती है जो पर्यावरण व इंसानों के लिए नुकसानदेह है जबकि गो-काष्ठ जलाने से 40 फीसद आक्सीजन निकलती है जो पर्यावरण संरक्षण में मददगार होगी। गोकाष्ठ में लेकमड (तालाब का कीचड़) मिलाई जाती है जिससे देर तक जलती है। अंत्येष्टि में अमूमन 7 से 11 मन ( एक मन में 40 किलो) यानि पौने तीन से साढ़े चार किवंटल लकड़ी लगती है। शुद्धता के लिए 200 कंडे लगाए जाते हैं। एक अंत्येष्टि में गौकाष्ठ केवल डेढ़ से दो किवंटल लगेगी।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
स्वर्गीय पुष्पा देवी (86) के 3 बेटे एवं 3 बेटियां सहित पौत्र, पोत्रियां, भांजे, भांजी से भरापुरा परिवार है। बेटे त्रिलोकचंद, रामेश्वर, अशोक विजयवर्गीय सभी मालपुरा एवं जयपुर की गौशालाओं एवं गौ सेवा परिवार से लंबे समय से जुड़े हुए है। अपने परिवार में होने वाले सभी कार्यक्रमों में देशी गाय के दूध से बने उत्पाद का ही उपयोग करते है। कई आयोजन गौशाला में भी कर चुके है। मालपुरा में गौ काष्ठ उपलब्ध नहीं होने से इन्होंने बगरू गौशाला से गौ काष्ठ मंगवाया और जिलेवासियों को पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश दिया। परिवार के सदस्य रामेश्वर, गोपाल विजयवर्गीय तो अपने नित्य भोजन में भी सिर्फ देशी गाय के उत्पाद का ही प्रयोग करते है। इनकी पहल की सराहना करते हुए मालपुरा के गौ प्रेमियों ने अब मालपुरा में आगे भी इस पहल को जारी रखने के लिए निर्णय लिया है।